रूस-यूक्रेन युद्ध और मौत

रूस-यूक्रेन युद्ध और मौत: सपनों की बलि

​हरियाणा के फतेहाबाद जिले के कुम्हारिया गांव में आज मातम पसरा है। एक साल के भीतर उसी छोटे से गांव ने अपने दूसरे लाल को खो दिया है। यह कहानी केवल एक युवा की मृत्यु की नहीं है, बल्कि उन हजारों सपनों की है जो गरीबी और बेरोजगारी के दलदल से निकलकर विदेश की धरती पर बेहतर भविष्य तलाशने गए थे। लेकिन वहां उन्हें क्या मिला? केवल रूस-यूक्रेन युद्ध और मौत का एक भयावह चक्र। विजय पूनिया, जो जुलाई 2025 में बड़े अरमानों के साथ बिजनेस वीजा पर रूस गया था, अब तिरंगे में लिपटकर नहीं, बल्कि एक ताबूत में बंद होकर अपने घर लौट रहा है।

विजय की कहानी किसी को भी झकझोर कर रख सकती है। वह अपने परिवार का सहारा बनना चाहता था, अपनी बूढ़ी मां माया देवी और छोटे भाई सुनील के भविष्य को संवारना चाहता था। उसके पिता का साया पहले ही सिर से उठ चुका था, इसलिए सारी जिम्मेदारी विजय के कंधों पर थी। परिवार ने कर्ज लेकर उसे विदेश भेजा था ताकि वह वहां जाकर कुछ पैसे कमा सके और घर की तंगहाली दूर कर सके। उसे क्या पता था कि जिस रास्ते पर वह सुनहरे भविष्य के सपने देख रहा है, वही रास्ता उसे रूस-यूक्रेन युद्ध और मौत की तरफ ले जाएगा।

एजेंटों का मायाजाल और जबरन भर्ती

​रूस पहुंचने के बाद विजय को उन ‘एजेंटों’ ने अपने जाल में फंसा लिया जो मासूम युवाओं को नौकरी का झांसा देकर मौत के मुंह में धकेल देते हैं। विजय को बताया गया था कि उसे हेल्पर या किसी सामान्य काम में लगाया जाएगा, लेकिन असलियत इससे कोसों दूर थी। उसे और उसके जैसे कई अन्य भारतीय युवाओं को जबरन रूसी सेना में भर्ती कर लिया गया। जब विजय ने इसका विरोध किया, तो उसे डराया-धमकाया गया। अंततः उसे फ्रंटलाइन पर भेज दिया गया, जहां केवल रूस-यूक्रेन युद्ध और मौत का तांडव हो रहा था।

यह पहली बार नहीं है जब कुम्हारिया गांव ने किसी को खोया है। इससे पहले गांव के ही अंकित जांगड़ा की भी इसी तरह मौत हो गई थी। अंकित और विजय दोनों दोस्त थे और दोनों ही इस धोखाधड़ी का शिकार हुए। अंकित का पार्थिव शरीर 4 अप्रैल को गांव आया था, और अब 25 दिनों के भीतर विजय की मौत की खबर ने पूरे इलाके को सुन्न कर दिया है। इन युवाओं के आखिरी वॉयस मैसेज आज भी उनके परिजनों के कानों में गूंज रहे हैं, जिसमें वे कह रहे थे, “हमें यहां से बचा लो, ये हमें युद्ध में भेज रहे हैं।” लेकिन विडंबना देखिए, सिस्टम की सुस्ती और युद्ध की विभीषिका ने उन्हें रूस-यूक्रेन युद्ध और मौत के हवाले कर दिया।

अपनों का इंतजार और सिस्टम पर सवाल

​विजय का परिवार पिछले कई महीनों से सरकार और दूतावास के चक्कर काट रहा था। 13 सितंबर 2025 को विजय और अंकित की आख़िरी बार घर पर बात हुई थी। उन्होंने साफ़ कहा था कि उन्हें जबरदस्ती युद्ध में धकेला जा रहा है। तब से लेकर आज तक परिवार केवल गुहार लगाता रहा, लेकिन नतीजा वही रहा जो डर था—रूस-यूक्रेन युद्ध और मौत। आज विजय की मां की आंखों के आंसू सूख चुके हैं और छोटा भाई सुनील, जो अभी पढ़ाई कर रहा है, अपने बड़े भाई के शव को लेने दिल्ली गया हुआ है।

यह घटना उन सभी युवाओं के लिए एक चेतावनी है जो बिना सोचे-समझे और गलत एजेंटों के माध्यम से विदेश जाने का जोखिम उठाते हैं। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा संघर्ष अब केवल दो देशों की सीमा का विवाद नहीं रहा, बल्कि यह दुनिया भर के उन गरीब परिवारों के लिए काल बन गया है जिनके बच्चे वहां फंसे हुए हैं। विजय पूनिया जैसे युवाओं को युद्ध की रणनीति का ‘क’ भी नहीं पता था, लेकिन उन्हें सीधे गोलियों और बमों के बीच खड़ा कर दिया गया। यह सीधे तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन है, जिसका अंत रूस-यूक्रेन युद्ध और मौत के रूप में हो रहा है।

एक गांव, दो अर्थियां और अनगिनत सवाल

​कुम्हारिया गांव आज भारत के उन सैकड़ों गांवों का प्रतिनिधित्व कर रहा है जहां के युवा रोजगार की तलाश में अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं। जब अंकित की मौत हुई थी, तब प्रशासन ने बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन विजय को नहीं बचाया जा सका। क्या हमारी विदेश नीति और सुरक्षा एजेंसियां इन अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करों और एजेंटों पर नकेल कसने में नाकाम रही हैं? क्या विजय की मौत को टाला जा सकता था? इन सवालों का जवाब देने वाला कोई नहीं है। आज पूरा गांव केवल एक ही सच देख रहा है, और वह है रूस-यूक्रेन युद्ध और मौत का खौफनाक मंजर।

​दो महीने पहले ही विजय का डीएनए सैंपल मंगवाया गया था, जिससे परिवार को अंदेशा हो गया था कि कुछ अनहोनी हो चुकी है। फिर भी, एक उम्मीद की किरण बाकी थी कि शायद वह जिंदा वापस आ जाए। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। आज जब विजय का शव गांव पहुंचेगा, तो वह केवल एक लाश नहीं होगी, बल्कि उन नीतिगत विफलताओं का प्रमाण होगी जिन्होंने एक और मां की गोद उजाड़ दी। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आधुनिक युग में भी इंसानियत को रूस-यूक्रेन युद्ध और मौत की भेंट चढ़ाया जा रहा है।

निष्कर्ष: कब थमेगा यह सिलसिला?

​विजय पूनिया और अंकित जांगड़ा जैसे युवाओं की शहादत (या कहें हत्या) समाज के लिए एक बड़ा सबक है। हमें अपने युवाओं को जागरूक करना होगा कि वे ‘फास्ट ट्रैक’ सफलता के चक्कर में जानलेवा रास्तों का चुनाव न करें। साथ ही, सरकार को उन एजेंटों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए जो चंद पैसों के लिए युवाओं को रूस-यूक्रेन युद्ध और मौत के कुएं में धकेल देते हैं।

जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे मामलों में सख्त हस्तक्षेप नहीं होगा, तब तक किसी न किसी गांव से ऐसी खबरें आती रहेंगी। आज कुम्हारिया रो रहा है, कल कोई और गांव रोएगा। विजय तो चला गया, लेकिन उसके पीछे छोड़ गया है एक टूटा हुआ परिवार और समाज के माथे पर एक बड़ा सवालिया निशान। हमें समझना होगा कि युद्ध कभी किसी का भला नहीं करता, वह सिर्फ और सिर्फ रूस-यूक्रेन युद्ध और मौत जैसी त्रासदी ही पैदा करता है। विजय की आत्मा को शांति मिले, लेकिन

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